नई दिल्ली, 12 जून:
लाल किले के अंदर नहर-ए-बहिश्त नाम का एक महल है। यहाँ पर लिखी एक आयत कहती है, "यदि पृथ्वी पर कहीं जन्नत है, तो वो यहीं है, यहीं है, यहीं है।" इसका परिरूप कुरान में वर्णित स्वर्ग या जन्नत के अनुसार माना जाता है। महल की योजना मूलरूप से इस्लामी रूप में है, लेकिन इसमें बने प्रत्येक मण्डप अपने वास्तु घटकों में हिन्दू वास्तुकला को प्रकट करते है।
तपती धूप में लाल हो चुके चेहरे के साथ मैंने लाल किला में लाहौरी गेट से प्रवेश किया। भारी भीड़ थी। लेकिन फिर भी लाल किला के लगभग पौने चार सौ साल के इतिहास को समझने की ललक थी। करीब 4 घंटे के बाद बाहर निकले तो मन में सैकड़ों सवालों के जवाब थे। इसलिए यहां आना और बहुत कुछ समझकर जाने जैसा है।
इतिहास
विश्व धरोहर की सूची में शामिल दुनिया के इस सर्वश्रेष्ठ किले का निर्माण मुगल सम्राट शाहजहां द्वारा 1638 ईसवी में शुरू कराया गया था। जो बनकर 1648 ईसवी में तैयार हुआ था। यह लगभग 250 एकड़ जमीन में फैला हुआ है। उस समय के प्रसिद्ध वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी को इस किले की शाही डिजाइन बनाने के लिए चुना गया था। उन्होंने लाल किला को बनवाने में अपनी पूरी विवेकशीलता और कल्पनाशीलता का इस्तेमाल कर भव्य रूप प्रदान किया।
17वीं शताब्दी में जहान्दर शाह का लाल किले पर कब्जा हो गया था। लेकिन तब करीब 30 वर्षों तक लाल किला बिना शासक के रहा। इसके बाद नादिर शाह ने लाल किले पर हमला बोल दिया और खूब लूटपाट की। आगे भी हमले हुए, और ऐसे ही लूटपाट तथा खून खराबे होते गए। उस समय के उर्दू के मशहूर शायर मीर तकी मीर लिखते है।
दिल की वीरानी
का क्या मजकुर
(वर्णन) है
ये नगर सौ
मर्तबा लूटा गया।
लाहौरी गेट
19वीं सदी में अंग्रेजों ने लाल किले पर अपना कब्जा जमा लिया और इस किले में एक बार फिर से जमकर लूट-पाट हुई। 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम विफल हो गया था। मुगल शासन के अंतिम बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र को रंगून निर्वासित कर दिया गया। उनका कवि दिल रो पड़ा, उन्होंने लिखा;
नहीं हाले-दिल्ली
सुनने सुनाने के काब़िल
ये किस्सा है रोने
रुलाने के काबिल।
उम्रे-दराज़ मांग के
लाए थे चार दिन
दो आरजू में कट गए
गए दो इंतिजार में।
कितना है बदनसीब
'ज़फ़र' दफ़न के लिए
दो गज़ ज़मी भी मिल
न सकी कूए-यार (अपनी भूमि) में।
कलाकृति, दीवान-ए-ख़ास
आजादी के बाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस पर तिरंगा फहराया। प्रथम प्रधानमंत्री ही सर्वाधिक 17 बार तिरंगा फहरा चुके। फिर इसके बाद हर प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देशवासियों को संबोधित करते है औऱ तिरंगा फहराते है। हाल में ही भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस प्राचीर की दीवार से अपने भाषण का अंत कुछ इस तरीके से किया:
यही समय है, सही समय है,
भारत का अनमोल समय है।
असंख्य भुजाओं की शक्ति है,
हर तरफ़ देश की भक्ति है,
तुम उठो तिरंगा लहरा दो,
भारत के भाग्य को फहरा दो।
यही समय है, सही समय है,
भारत का अनमोल समय है।
क्या है खास?
लाल किले के अंदर आप नक्कारखाना, दीवान-ए-आम, नहर-ए-बहिश्त, ज़नाना, खास महल, दीवान-ए-ख़ास, मोती मस्जिद, हयात बख़्श बाग का अवलोकन कर सकते है। इसके इतर किले के अदंर कई संग्रहालय भी है। जिन्हें घूमना चाहिए।
संग्रहालय
सुभाष चंद्र बोस संग्रहालय: यह जिस बिल्डिंग में है, वही पर ही सुभाष चंद्र बोस जी पर और उनके आजाद हिंद फौज के सिपाहियों पर मुकदमा चलाया गया था। इस संग्रहालय में सुभाष चंद्र बोस जी के जीवन को दिखाया गया है।
याद-ए-जलियां: इस संग्रहालय में जलियांवाला बाग से जुड़ी यादें हैं। 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में निहत्थे लोगों पर अंग्रेज सैनिकों ने अंधाधुंध गोली चलाई थी। इस हृदय विदारक घटना का यहां दृश्यात्मक रूप दिया गया है। जो शहीदों के बलिदान को बताता है।
आजादी के दीवाने: आजादी की लड़ाई में अनगिनत लोगों ने अपनी जान गंवाई। इसमें से बहुत कम लोगों के बारे में जानकारी है। ऐसे बहुत से सेनानी थे, जिन्हें लोग आज भी नहीं जानते। ऐसे ही लोगों की याद में यह संग्रहालय बनाया गया हैं।
1857 प्रथम स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय: इस संग्रहालय में आजादी की पहली लड़ाई से जुड़ी चीजें शामिल है। उस दौरान क्या क्या गतिविधियां हुई, उसे समझा जा सकता है।
क्यों और कैसे जाएँ?
आज लाल किला देश का गौरव भी है और इतिहास के अद्भुत शिल्पकारिता का सुंदर परिचय भी है। इस लिहाज़ यहां आना चाहिए और सभी संग्रहालय भी घूमना चाहिए। सोमवार और राष्ट्रीय अवकाश को छोड़कर आप यहां सुबह 10 बजे से शाम 7:00 तक आ सकते हैं। टिकट का भारतीय नागरिक के लिए 80 रुपए और विदेशी नागरिक के लिए 800 रुपया लगता है, म्यूजियम सहित। अपने वाहन से या लाल किला मेट्रो स्टेशन के जरिए आप यहाँ आ सकते है।
- विकास धर

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें